Covid 19 patient shows positive results in plasma therapy at Delhi's Max Hospital



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    दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल ने कोविड-19 के मरीज़ों का 'प्लाज़्मा थेरेपी' से इलाज किया है. उनका दावा है कि इस इलाज से लोगों के स्वास्थ्य में सुधार देखने को मिल रहा है.

    भारत में कोविड-19 के इलाज के लिए प्लाज़्मा थेरेपी को सीमित तौर पर ट्रायल की सशर्त इजाजत भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और ड्रग्स कंट्रोलर-जनरल ऑफ़ इंडिया को देना है.

    फ़िलहाल ये इजाज़त मैक्स अस्पताल को नहीं मिली है. लेकिन कम्पैशनेट ग्राउंड, यानी अनुकंपा के आधार पर मैक्स ने एक मरीज़ पर ये ट्रायल किया है और नतीज़े सकारात्मक आए हैं.

    मैक्स अस्पताल का दावा है कि कोविड19 का ये मरीज़ अब वेंटिलेटर पर नहीं है. 14 अप्रैल को उनका प्लाज़्मा थेरेपी से इलाज शुरू किया गया था.

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    दिल्ली के इस मरीज़ की उम्र 49 साल है. इन्हें 4 अप्रैल को अस्पताल में बुख़ार और सांस लेने की दिक्कत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

    इनकी तबीयत धीरे-धीरे और बिगड़ती चली गई, फिर इन्हें ऑक्सीजन पर रखने की नौबत आ गई. उन्हें निमोनिया हो गया और 8 अप्रैल आते-आते मरीज़ को वेंटिलेटर सपोर्ट की ज़रूरत पड़ी. इसके बाद परिवार ने डॉक्टरों से प्लाज़्मा थेरेपी के ज़रिए इलाज करने की गुज़ारिश की.

    परिवार ने प्लाज़्मा के लिए डोनर भी ख़ुद ही ढूंढा और 14 अप्रैल को नए तरीक़े के साथ इलाज शुरू किया गया. मरीज़ 18 अप्रैल से वेंटिलेटर सपोर्ट पर नहीं हैं और फ़िलहाल स्वस्थ बताए जा रहे हैं. हालांकि डॉक्टरों ने उन्हें अपनी निगरानी में अस्पताल में ही रखा है.

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    कौन होता है डोनर
    प्लाज़्मा थेरेपी से इलाज इस धारणा पर आधारित है कि वे मरीज़ जो किसी संक्रमण से उबर जाते हैं उनके शरीर में संक्रमण को बेअसर करने वाले प्रतिरोधी ऐंटीबॉडीज़ विकसित हो जाते हैं. इन ऐंटीबॉडीज़ की मदद से कोविड-19 रोगी के रक्त में मौजूद वायरस को ख़त्म किया जा सकता है.

    कोविड-19 में इलाज से ठीक हुए लोग ही इस थेरेपी में डोनर बन सकते हैं. इस थेरेपी के लिए जारी दिशा-निर्देश के मुताबिक, "किसी मरीज़ के शरीर से ऐंटीबॉडीज़ उसके ठीक होने के दो हफ्ते बाद ही लिए जा सकते हैं और उस रोगी का कोविड-19 का एक बार नहीं, बल्कि दो बार टेस्ट किया जाना चाहिए."

    ठीक हो चुके मरीज़ का एलिज़ा (एन्ज़ाइम लिन्क्ड इम्युनोसॉर्बेन्ट ऐसे) टेस्ट किया जाता है जिससे उनके शरीर में ऐंटीबॉडीज़ की मात्रा का पता लगता है.

    लेकिन ठीक हो चुके मरीज़ के शरीर से रक्त लेने से पहले राष्ट्रीय मानकों के तहत उसकी शुद्धता की भी जाँच की जाती है.

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    मैक्स अस्पताल के ग्रुप मेडिकल डॉयरेक्टर डॉ. संदीप के मुताबिक, "डोनर वही बन सकता है, जिसको कोई दूसरी बीमारी ना हो. कोविड से ठीक हुए दो हफ्ते गुजर चुके हो. और किसी और तरह की दवाई का सेवन नहीं कर रहे हों. उनके रक्त की जांच की जाती है. हेपाटाइटिस बी, सी और एचआईवी के लिए. फिर से कोरोना की जांच की जाती है. इन सबकी रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद डोनर की वेन्स चेक की जाती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि अगर डोनर की वेन्स बहुत पतली हो तो ये प्लाज्मा थेरेपी सफल नहीं हो सकती है."

    डोनर की शुरुआती जांच में 7- 8 घंटे का वक़्त लगता है. इसके बाद फिट डोनर के ख़ून से प्लाज़्मा निकाला जाता है. डॉ. संदीप कहते हैं, "डोनर से प्लाज़्मा निकालने में 2 घंटे का वक्त लगता है. डोनर उसी दिन घर जा सकता है और इस पूरी प्रक्रिया का डोनर पर कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता."

    दिल्ली के मैक्स अस्पताल में जिस मरीज़ का इलाज इस प्रक्रिया से हुआ है, उन्होंने अपने लिए डोनर ख़ुद ढूंढा था.

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    सरकार से मान्यता
    कोविड-19 के मरीज का इलाज प्लाज़्मा थेरेपी से करने के आईसीएमआर और ड्रग्स कंट्रोलर-जनरल ऑफ़ इंडिया दोनों की मंज़ूरी लेनी होती है. केरल सरकार ने सबसे पहले इसकी मंज़ूरी मांगी थी. देश के अलग-अलग राज्यों से 30 से अधिक अस्पतालों ने इसकी इजाज़त मांगी है.

    मंज़ूरी मिलने के बाद इस थेरेपी का क्लीनिकल ट्रायल शुरू होगा. जिसके लिए डोनर की ज़रूरत पड़ेगी.

    भारत सरकार के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक़, देश भर में तकरीबन तीन हजार से ज़्यादा लोग कोविड-19 के इलाज के बाद ठीक हो चुके हैं. इनमें से जितने लोग 3 हफ्ते पहले ठीक हुए हैं वो डोनर बन सकते हैं. लेकिन इसके लिए वो सामने नहीं आ रहे.

    और यही है इस इलाज़ में सबसे बड़ी अड़चन.

    दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंस (आईएलबीएस) ने भी इसके लिए मंज़ूरी मांगी थी, जो उन्हें मिल गई है.

    आईएलबीएस के डॉ. एसके सरीन के मुताबिक़ कोविड-19 के मरीज़ तैयार हैं, लेकिन उन मरीज़ों पर क्लीनिकल ट्रायल के लिए उन्हें डोनर ही नहीं मिल रहे हैं.

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    बीबीसी से बातचीत में डॉ. सरीन ने बताया कि डोनर ना मिलने की वजह से वो प्लाज़्मा थेरेपी का ट्रायल शुरू नहीं कर पा रहे हैं.

    जितने लोग कोविड-19 से ठीक हो कर गए हैं, उनके फ़ोन नंबर और परिवार के सदस्यों के सारे नंबर सरकार के पास उपलब्ध हैं. लेकिन जब उन लोगों से संपर्क साधा जाता है तो वो डोनर बनने से मना कर देते हैं.

    डॉ. सरीन के मुताबिक़ एक डोनर को एक से डेढ़ घंटे की काउसिलिंग डॉक्टर दे रहे हैं, इसके बाद भी लोग तैयार नहीं हो रहे हैं. कोई कमज़ोरी का बहाना बना रहा है, कोई लॉकडाउन का बहाना, कोई घर पर दूसरे लोगों तैयार नहीं है, ये कह कर बच रहे हैं.

    डॉ सरीन के मुताबिक़ इस मुद्दे पर जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है. चूंकि ये बीमारी नई है और लोगों को इसके बारे में ज़्यादा मालूम नहीं है, ये सबसे बड़ी वजह है लोगों के डर की.

    हालांकि कोविड-19 के इलाज के लिए प्लाज़्मा थेरेपी कोई सटीक तरीक़ा अब तक माना नहीं गया है. देश में केवल कुछ जगहों पर ही इसके इस्तेमाल की सशर्त इजाज़त दी गई है, लेकिन वो भी करने में अब अड़चन का सामना करना पड़ रहा है.

    अकेले दिल्ली में लगभग 431 मरीज़ ठीक होकर अपने घर जा चुके हैं.

    डॉ सरीन के मुताबिक़ इन 431 में से 151 ही ऐसे हैं जिनके 3 हफ्ते हो चुके हैं और वो डोनर बन सकते हैं.

    केरल सरकार को अभी तक इस मामले में मंज़ूरी का इंतज़ार है.

    कैसे निकाला जाता है ख़ून
    ठीक हो चुके रोगी के शरीर से ऐस्पेरेसिस तकनीक से ख़ून निकाला जाता है जिसमें ख़ून से प्लाज़्मा या प्लेटलेट्स को निकालकर बाक़ी ख़ून को फिर से उसी रोगी के शरीर में वापस डाल दिया जाता है.

    मैक्स अस्पताल के डॉक्टर संदीप बुद्धिराजा के मुताबिक़, "ऐंटीबॉडीज़ केवल प्लाज़्मा में मौजूद होते हैं. डोनर के शरीर से लगभग 400 मिलीलीटर प्लाज़्मा लिया जाता है. इसमें से रोगी को लगभग 200 मिलीलीटर ख़ून चढ़ाने की ज़रूरत होती है. यानी एक डोनर के प्लाज़्मा का दो रोगियों में इस्तेमाल हो सकता है."

    डॉक्टर संदीप ने बताया कि इस थेरेपी का इस्तेमाल केवल कोविड-19 के सीवियर मरीज़ों के लिए ही किया जाना चाहिए.

    मैक्स अस्पताल का दावा है कि सरकार अस्पतालों को इस थेरेपी की इजाज़त देने में ज्यादा वक़्त लगा रही है.

    कितना कारग़र है ये इलाज
    डॉ. संदीप कहते हैं, "इस नई थेरेपी के इस्तेमाल से कोविड-19 के इलाज में एक नई तकनीक ज़रूर जुड़ गई है. लेकिन हमें ये भी समझना होगा कि ये कोई जादू की छड़ी नहीं है. हमने अपने मरीज़ पर कोविड-19 के इलाज में प्लाज़्मा थेरेपी के साथ-साथ बाक़ी दूसरे तरीक़ों को इलाज में शामिल रखा. जिससे ये पता चलता है कि ये प्रक्रिया 'केटेलिस्ट' यानी उत्प्रेरक का काम करती है. केवल प्लाज़्मा थेरेपी से ही सब ठीक हो रहे हैं, ऐसा नहीं है."

    चीन और दक्षिण कोरिया में भी इस इलाज का इस्तेमाल हो रहा है.

    Source : BBC Hindi


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